भारत का संविधानिक विकास(1773-1950)
संवैधानिक इतिहास---
1 किसी भी देश के संविधान का निर्माण सदैव
उसके अतीत की नींव पर किया जाता है । अत: किसी भी विद्यमान तथा लागू संविधान को
समझने के लिए उसकी पृष्ठनभूमि तथा उसके इतिहास को जानना आवश्याक है।
2 प्राचीन भारत में ऋग्वेधद तथा अथर्ववेद मे
सभा(आम सभा) तथा समिति(बयोवृद्धों की सभा ) का उल्लेनख मिलता है। जो इस बात का
साक्ष्यर है कि भारतीय इतिहास के वैदिकोत्तहर काल में अनेक सक्रिय गणतंत्र
विद्यमान थे।
3 ई0पू0 चौथी शताब्दी्
में शुद्रक मल्लह संध नामक गणतंत्र ने सिंकदर का डटकर मुकाबला किया था। वह राज्य0 एक गणतंत्र
था। उसका शासन एक सभा चलाती थी। उसका एक निर्वाचित अध्यहक्ष होता था और उसे नायक
कहा जाता था।
4 10वीं शताब्दीा मे शुक्राचार्य ने नीतिसार की
रचना की जो संविधान पर लिखी गई पुस्ततक है।
5 आधुनिक संविधान का सबसे महत्व्पुर्ण स्त्रेा
त 1776 का अमेरिकी संविधान है। अमेरिकी संविधान को आधुनिेक युग
का पहला लिखित संविधान माना जाता है।
6 इंग्लै ण्डख का संविधान अलिखित संविधान है।
इंग्लै ण्डन के संविधान को संयोग और बुद्धिमता का शिशु कहा गया है।
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हमारा भारत सोने की
चिडिया है।
भारत में आगमन से पूर्व
इस देश के अनंत वैभव की कथाओं से विश्वा का कोई भी राष्ट्रक अनकजान न था। भारत
सोने का चिडिया कहलाता था। ब्रिटेन वासी भी भारत की धन सम्प्दा एवं समृद्धि से
अवगत थे और भली भंाती इस बात को जानते थे कि भारत भविष्य में उनके खुलेबाजार की मांग की पुर्ति कर
सकता है । इसी बीच रैल्फभफिटज नामक एक प्रसिद्ध व्यारपारी भारत, बर्मा आदि में लंबे प्रवास के बाद 1594 में
इंगलैण्डा वापस पहुचां । भारत में
अनुकुल व्या पारिक परिस्थितियों के विषय में अनेक रोचक कथाएं उससे सुनकर
ब्रिटेनवासी अत्यं त प्रभावित हुए। सितम्बलर 1599 में लंदन के कुछ व्याचपारियों
ने लॉर्ड मेयर की अध्य क्षता मेंएक सभा का आयेाजन किया।इसमें पूर्वी द्वीप समूह
के साथ व्याएपार करने के आशय से एक कंपनी का गठन किया गया । इस कंपनी का नाम
गवर्नर एण्डा कम्पपनी ऑफ लंदन ट्रेडिंग इन टू दि ईस्टग इंडीज रखा गया।
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भारतिय संवधिान कि विकास कई
चरण है---
भारत में
संवैधानिक विकास की शुरुआत ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना (1600 ई०) से माना जा
सकता है। 31 दिसम्र्ई 1600 को ब्रिटिश
महारानी ने कम्प नी को 15 वर्षो के लिए इस कंपनी को व्या पारिक अधिकार पत्र
प्रदान कर किया। ईस्ट इंडिया कंपनी अंग्रेज व्यापारियों का एक समूह था। इसे
ब्रिटिश सरकार ने भारत के साथ व्यापार करने का एकाधिकार प्रदान किया था। 1708
में इस कंम्नीरि का नाम बदलकर द
यूनाईटेड कम्नीर प् ऑफ मर्चेन्टपस ऑफ इंग्लैमण्डह ट्रेडिंग इन टू द ईस्टो इंडीज
कर दिया गया। कंपनी का यह नाम 1833 तक रहा। 1833 के चार्टर में इस कंपनी का नाम
ईस्टज इंडिया कंपनी कर दिया गया। व्यापार की रक्षा के नाम पर यूरोपीय कंपनियों
ने भारत में किलेबंदी करना और सेना रखना शुरू कर दिया। अपनी सैनिक शक्ति के दम
पर ईस्ट इंडिया कंपनी जल्द ही भारतीय रियासतों के राजनीतिक एवं आंतरिक मामलों
में हस्तक्षेप करने लगी और भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बन गई। 1757 की
प्लासी की लड़ाई के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में एक मुख्य राजनीतिक ताकत बन
गई। 1764 के बक्सर के युद्ध तथा 1765 की इलाहाबाद की संधि से तो कंपनी बंगाल,
बिहार और उड़ीसा में सर्वेसर्वा हो गई। भारत
में कंपनी की आर्थिक और राजनीतिक सफलताओं एवं कारगुजारियों की वजह से ब्रिटेन
में यह जरूरी समझा गया कि भारत में उसके क्रियाकलापों नियंत्रित किया जाए।
इर्स्टब इंडीया कंपनी ने अपना कार्य सूरत से प्रारंभ किया। इसी शासन को अपने
अनुकूल बनाए रखने के लिए अंग्रेजों ने समय-समय पर कई एक्ट पारित किए, जो भारतीय संविधान के विकास की सीढ़ियां
बनीं.
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वे निम्न हैं:
n
सविधान की मांग सर्वप्रथम
1895 में तिलक के स्वराज विधेयक मे परिलक्षित होती है।
n
1922 में महात्मा गांधी
के शब्दो में भारतीय संविधान का निर्माण भारतीयों की इच्छानुसार होना चाहिए।
n
1924 में मोतीलाल नेहरू
के शब्दो में भारतीय संविधान के निर्माण के लिए संविधान सभा का गठन किया जाना
चाहिए।
n
संविधान शब्द का
सर्वप्रथम प्रयोग ब्रिटिश नागरिक सर हैनरीमैन ने किया था । संविधान शब्द लैटिन
भाषा के Constitare शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है प्रबंध करना या व्यवस्था
करना।
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1.
1773 ई. का
रेग्यूहलेटिंग एक्ट:
तत्कागलीन
ब्रिटिश प्रधानमंत्री लार्ड नार्थ (गुप्त
समिति)द्वारा 1772 में गठित संसदीय समिति के प्रतिवेदन पर यह ऐक्टर पारित
किया गया था।यह प्रथम प्रयास था जिसके माध्यिम से भारत में केन्द्री य प्रशासन
की नींव रखी गयी।
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इस एक्ट का
अत्यधिक संवैधानिक महत्व है जैसे —
1 भारत में
ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यों को नियमित और नियंत्रित करने की दिशा में ब्रिटिश
सरकार द्वारा उठाया गया यह पहला कदम था |अर्थात कंपनी
के शासन पर संसदीय नियंत्रण स्थापित किया गया |
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2 इस एक्ट के
द्वारा पहली बार कंपनी के राजनैतिक और प्रशासनिक कार्यों को मान्यता मिली |इसके द्वारा केंद्रीय प्रशासन की नींव रखी गई
|
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3 इस एक्ट के
अंतर्गत कलकत्ता प्रेसिडेंसी में एक ऐसी सरकार स्थापित की गई, जिसमें गवर्नर जनरल और उसकी परिषद के चार
सदस्य थे,(क्लेीवरिंग,मॉनसन,बेरवैल्,फिलिप) जो अपनी सत्ता का उपयोग संयुक्त रूप
से करते थे. बंगाल के पहले गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स थे |
|
इसकी मुख्य बातें इस प्रकार हैं –
(i) कंपनी के शासन पर संसदीय नियंत्रण स्थापित किया गया.
|
(ii) बंगाल के गवर्नर को तीनों प्रेसिडेंसियों का जनरल नियुक्त
किया गया.
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(iii) कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गई. अधिनियम
के अन्तर्गत कलकत्ता में 1774 में
एक उच्चतम न्यायालय की स्थापना की गई ,जिसमे मुख्य
न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीश थे| सर एलीजा इम्पे
को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया।
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(iv) इसके तहत कंपनी के कर्मचारियों को निजी व्यापार करने और
भारतीय लोगों से उपहार व रिश्वत लेना प्रतिबंधित कर दिया गया |
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(v) इस अधिनियम के द्वारा ब्रिटिश सरकार का कोर्ट ऑफ़ डयरेक्टर्स के माध्यम से
कंपनी पर नियंत्रण सशक्त हो गया | अब कंपनी को
भारत में इसके राजस्व नागरिक और सैन्य मामलों की जानकारी ब्रिटिश सरकार को देना
आवश्यक कर दिया गया।
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ऐक्ट ऑफ सेटलमेंट 1781 – यह रेग्युलेटिंग
एक्ट की त्रुटियों को दूर करने के लिए पारित किया गया था। कलकता सरकार ब्ंगाल,बिहार और उडीसा के दीवानी
प्रदेशों के लिए विधि बना सकती थी। यह एक्ट ऑफ सेटलमेंट के अधीन था।
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2.
1784 ई. का पिट्स
इंडिया एक्ट:
रेग्यूलेटिंग एक्ट के
दोषों को दूर करने के लिये इस एक्ट को पारित किया गया। इस एक्ट से संबंधित
विधेयक ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री पिट द यंगर ने संसद में प्रस्तुत किया
तथा 1784 में ब्रिटिश संसद ने इसे पारित कर दिया।
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इस एक्ट के
द्वारा दोहरे प्रशासन का प्रारंभ हुआ। गवर्नर जनरल परिषद की संख्या चार से घटाकर
तीन कर दी गई।
-----इसने कंपनी
के राजनैतिक और वाणिज्यिक कार्यों को पृथक पृथक कर दिया |
(i) कोर्ट ऑफ़
डायरेक्टर्स - व्यापारिक मामलों के लिए
|
(ii) बोर्ड ऑफ़ कंट्रोलर- राजनीतिक मामलों के लिए.
|
------इसने निदेशक मंडल को कंपनी के व्यापारिक मामलों की अनुमति तो दी लेकिन
राजनैतिक मामलों के प्रबंधन के लिए नियंत्रण बोर्ड (बोर्ड ऑफ़ कण्ट्रोल )नाम से एक
नए निकाय का गठन कर दिया | इस प्रकार द्वैध
शासन व्यवस्था का शुरुआत किया गया |
------नियंत्रण बोर्ड को यह शक्ति थी की वह ब्रिटिश नियंत्रित भारत में सभी
नागरिक , सैन्य सरकार व राजस्व
गतिविधियों का अधीक्षण व नियंत्रण करे |
इस प्रकार यह अधिनियम दो कारणों से महत्वपूर्ण था –
1 भारत में कंपनी के अधीन क्षेत्रों को पहली बार ब्रिटिश अधिपत्य का क्षेत्र
कहा गया
2 दूसरा ब्रिटिश सरकार को भारत में कंपनी के कार्यों और इसके प्रशासन पर पूर्ण
नियंत्रण प्रदान
किया गया |
1786 का अधिनियम के द्वारा गवर्नर जनरल को
मुख्य सेनापति के भी अधिकार दे दिये गये। अब उसे विशेष परिस्थितियों मे परिषद
के निर्णय को रदद करने तथा अपने निर्णय लागू करने का विशेषाधिकार भी मिल गया।
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3.
1793 ई. का
चार्टर अधिनियम:
इसके द्वारा नियंत्रण
बोर्ड के सदस्यों तथा कर्मचारियों के वेतन आदि को भारतीय राजस्व में से देने की व्यचवस्थां
की गई.
4. 1813 ई. का
चार्टर अधिनियम: इसके द्वारा
(i) कंपनी के अधिकार-पत्र को 20 सालों के लिए बढ़ा दिया गया.
(ii) कंपनी के भारत के साथ व्यापर करने के एकाधिकार को छीन लिया
गया. लेकिन उसे चीन के
साथ व्यापर और पूर्वी देशों के साथ
चाय के व्यापार के संबंध में 20 सालों के लिए
एकाधिकार प्राप्त रहा.
(iii) कुछ सीमाओं के अधीन सभी ब्रिटिश नागरिकों के लिए भारत के
साथ व्यापार खोल दिया
गया.
(iv) भारतीयों की शिक्षा के लिए एक लाख रुपए वार्षिक की व्यवस्था
की गई।
(v)
ईसाई मिशनरियों को भारत
में धर्म प्रचार की अनुमति दी गई।
नोट—भारत मे स्थानीय स्वशासन
की शुरूआत चोल काल मे हुई थी।
4.
1833 ई. का
चार्टर अधिनियम: ( सेंट हेलेना अधिनियम)
ब्रिटिश भारत के केन्द्रीयकरण की दिशा में यह अधिनियम निर्णायक कदम था |इसके द्वारा भारत मे केन्द्रिय विधान मण्डल की धुधंली शुरूआत 1833 के अधिनियम
से हुआ। भारत मे सभी ब्रिटिश राज्य क्षेत्रो के लिए विधान परिषद की स्थापना की
गई । इस अधिनियम में गवर्नर जनरल की सरकार को भारत सरकार के नाम से जाना गया।
(i) कंपनी के व्यापारिक अधिकार पूर्णतः समाप्त कर दिए गए.
(ii) अब कंपनी का कार्य ब्रिटिश सरकार की ओर से मात्र भारत का
शासन करना रह गया.
(iii) बंगाल के गवर्नर जरनल को भारत का गवर्नर जनरल
कहा जाने लगा.जिसमे सभी नागरिक और सैन्य शक्तियां निहित थी |इस प्रकार इस अधिनियम में एक ऐसी सरकार का निर्माण किया जिसका ब्रिटिश कब्जे वाले
संपूर्ण भारतीय क्षेत्र पर पूर्ण नियंत्रण हो | लार्ड विलिअम बैंटिक भारत
के पहले गवर्नर जनरल थे |
(iv) इसने मद्रास और
बम्बई के गवर्नरों को विधायिका संबंधी शक्ति से वंचित कर दिया |भारत के गवर्नर जनरल को पूरे ब्रिटिश भारत में विधायिका के असीमित अधिकार प्रदान
कर दिए गए | इसके अन्तर्गत पहले बनाए गए कानूनों को नियामक
कानून कहा गया और नए कानून के तहत बने कानूनों को एक्ट या अधिनियम कहा गया |
(v) भारतीय कानूनों
का वर्गीकरण किया गया तथा इस कार्य के लिए विधि आयोग की नियुक्ति
की व्यवस्था की गई. एक विधि आयोग का गठन किया
गया। लार्ड मैकाले विधि आयोग का प्रथम अध्यक्ष बनाया गया।
() दास प्रथा गैर कानूनी
घोषित हुई।
5.
1853 ई. का
चार्टर अधिनियम:
-----इसने पहली बार गवर्नर जनरल की परिषद् के विधायी एवं
प्रशासनिक कार्यों को अलग कर दिया |इसके तहत परिषद् में 6 नए पार्षद और जोड़े गए ,इन्हें विधान पार्षद कहा गया |
------ संसदीय पद्धतिका आरंभ हुआ।
----- भारत के लिए समरूप कानून बनाने एवं
कानूनो का संग्रह के लिए विधि आयोग बना फलत: निम्न संहिता बने
·
सिविल प्रोसिजर
कोड 1859
·
इंडियन पेनल कोड
1860
·
क्रिमिनल
प्रोसिजर कोड 1861
----- इस अधिनियम के द्वारा सेवाओं में नामजदगी का सिद्धांत
समाप्त कर कंपनी के महत्वपूर्ण पदों को प्रतियोगी परीक्षाओं के आधार पर भरने की
व्यवस्था की गई. इसने सिविल सेवाओं की भर्ती एवं चयन हेतु खुली प्रतियोगता
व्यवस्था का शुभारम्भ किया ,और पहली बार सिविल सेवा को भारतीयों के लिए खोल
दिया गया और इसके लिए 1854 में मैकाले समिति की नियुक्ति की गई |
-----इसने पहली बार
भारतीय केंद्रीय विधान परिषद् में स्थानीय प्रतिनिधित्व प्रदान किया |गवर्नर जनरल की परिषद् में 6 नए सदस्यों में से
4 का चुनाव बंगाल , मद्रास , बम्बई और आगरा की स्थानीय प्रांतीय सरकारों
द्वारा किया जाना था |
राज्यों में विधान परिषद गठित
|
|
राज्य
|
वर्ष
|
बंगाल
|
1862
|
उतर पश्चिम प्रांत
|
1866
|
पंजाब
|
1897
|
1853 के अधिनियम ने सम्पुर्ण भारत के लिए एक विधान मण्डल की स्थापना की।
नोट - सत्येन्द्र
नाथ टैगोर ने सबसे पहले सिविल सेवा परीक्षा पास की थी।
नोट:- सर्वप्रथम
सिविल परीक्षा का प्रयोग मौर्यकाल में चाण्क्य द्वारा किया गया था।
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