Wednesday, 15 April 2020

1.2 भारत का संवेधानिक विकास 1858 -1950


1.       1858 ई. का चार्टर अधिनियम:
1857 के विद्रोह ने कंपनी की, जटिल परिस्थितियों में प्रशासन की सीमाओं को स्पष्ट कर दिया था। इसके पश्चात कंपनी से प्रशासन का दायित्व वापस लेने तथा ताज (crown) द्वारा भारत का प्रशासन प्रत्यक्ष रूप से संभालने की मांग और तेज हो गयी। इसीलिये यह अधिनियम पारित किया गया।



---- भारत का शासन कंपनी से लेकर ब्रिटिश क्राउन के हाथों सौंपा गया. अब भारत का शासन, ब्रिटिश साम्राज्ञी की ओर से भारत राज्य सचिव (secretary of state for India) को चलाना था जिसकी सहायता के लिए 15 सदस्यीय भारत परिषद (India council) का गठन किया गया। अब भारत के शासन से संबंधित सभी कानूनों एवं कदमों पर भारत सचिव की स्वीकृति अनिवार्य कर दी गयी जबकि भारत परिषद केवल सलाहकारी प्रकृति की थी। (इस प्रकार पिट्स इंडिया एक्ट द्वारा प्रारंभ की गयी द्वैध शासन की व्यवस्था समाप्त कर दी गयी)।
डायरेक्टरों की सभा (Court of Directors) और नियंत्रण बोर्ड या अधिकार सभा (Board of Control) समाप्त कर दिये गये तथा उनके समस्त अधिकार भारत सचिव को दे दिये गये।
भारत परिषद के 15 सदस्यों में से 7 सदस्यों की नियुक्ति का अधिकार सम्राट तथा शेष सदस्यों के चयन का अधिकार कंपनी के डायरेक्टरों को दे दिया गया।
अखिल भारतीय सेवाओं तथा अर्थव्यवस्था से सम्बद्ध मसलों पर भारत सचिव, भारत परिषद की राय मानने को बाध्य था।
भारत के गवर्नर-जनरल को भारत सचिव की आज्ञा के अनुसार कार्य करने के लिये बाध्य कर दिया गया।
अब गवर्नर-जनरल, भारत में ताज के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने लगा। तथा उसे वायसरायकी उपाधि दी गयी। लार्ड कैनिंग पहला वायसराय बना। इस अधिनियम के अनुसार सर चार्ल्सयवुड प्रथम भारत सचिव बने थे।
संरक्षण-ताज, सपरिषद राज्य सचिव तथा भारतीय अधिकारियों में बंट गया।
अनुबद्ध सिविल सेवा (covenanted civil service) में नियुक्तियां खुली प्रतियोगिता द्वारा की जाने लगीं।

-----भारत राज्य सचिव एक निगम निकाय (Corporate Body) घोषित किया गया, जिस पर इंग्लैंड एवं भारत में दावा किया जा सकता था अथवा जो दावा दायर कर सकता था।
----वायसराय लार्ड केनिंग ने सर्वप्रथम विभाग प्रणाली की शुरूआत की।
            ---- इसे भारतीय स्‍वतंत्रता का मैग्नाकार्टा कहा गयाहै।
7         1861 ई. का भारत शासन अधिनियम:

----गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषद का विस्तार किया गया,
---- विभागीय प्रणाली का प्रारंभ हुआ,
---- गवर्नर जनरल को पहली बार अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान की गई.
---- गवर्नर जरनल को बंगाल, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत और पंजाब में विधान परिषद
    स्थापित करने की शक्ति प्रदान की गई.
----इसके द्वारा कानून बनाने की प्रक्रिया में भारतीय प्रतिनिधियों को शामिल करने की
   शुरुआत की |
-----इस अधिनियम में मद्रास और बम्बई प्रेसीडेन्सियों को विधायी शक्तियां पुनः देकर
    विकेन्द्रीकरण प्रक्रिया की शुरुआत की |
1873 का अधिनियम – 1 जनवरी 1884 को ईस्‍ट इण्डिया कंपनी को औपचारिक रूप से भंग कर दिया गया।
1876 का शाही उपाधि अधिनियम--- केंद्रीय कार्यकारिणी में छठे सदस्‍य की नियुक्‍ती कर उसे लोक निमार्ण विभाग का कार्य सौंपा गया तथा विक्‍टोरिया को भारत का साम्राज्ञी घोषित किया गया।

8 1892 ई. का भारत शासन अधिनियम:
(i)                  अप्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली की शुरुआत हुई,
(ii)                इसके माध्यम से केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों में अतिरिक्त (गैर सरकारी ) सदस्यों की संख्या बधाई गई |
(iii)               इसने विधान परिषदों के कार्यों में वृद्धि कर उन्हें बजट पर बहस करने और कार्यपालिका के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए अधिकृत किया |
(iv)              इसने केंद्रीय विधान परिषद् और बंगाल चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स में गैर सरकारी सदस्यों के नामांकन के लिए वायसराय की शक्तियों का प्रावधान था |
(v)                सुरेन्‍द्र नाथ बनर्जी ने इसे प्रतिनिध्‍यात्‍मक शासन की नींव का प्रस्‍तर की संज्ञा दी है।

9. 1909 ई० का भारत शासन अधिनियम [मार्ले -मिंटो सुधार] -
1 पहली बार मुस्लिम समुदाय के लिए पृथक प्रतिनिधित्व का उपबंध किया गया.
       2 भारतीयों को भारत सचिव एवं गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषदों में नियुक्ति की गई.
3 केंद्रीय और प्रांतीय विधान-परिषदों को पहली बार बजट पर वाद-विवाद करने, सार्वजनिक हित के विषयों पर प्रस्ताव पेश करने, पूरक प्रश्न पूछने और मत देने का अधिकार मिला.प्रांतीय विधान परिषदों की संख्या में वृद्धि की गई.
4 इसने केंद्रीय और प्रांतीय विधानपरिषदों के आकर में काफी वृद्धि की | केंद्रीय परिषद् में इनकी संख्या 16 से ६० हो गई |प्रांतीय विधानपरिषदों में इनकी संख्यां एक सामान नही थी |
5         इसने केंद्रीय परिषद् में सरकारी बहुमत को बनाए रखा लेकिन प्रन्त्येन परिषदों में गैर सरकारी सदस्यों के बहुमत की अनुमति थी |
6         इसने दोनों स्तरों पर विधान परिषद् के चर्चा कार्यों का दायर बढ़ाया , जैसे अनुपूरक प्रश्न पूछना , बजट पर संकल्प रखना आदि |
7         इस अधिनियम के अन्तर्गत पहली बार किसी भारतीय को वायसराय और गवर्नर की कार्यपरिषद के साथ एसोसिएशन बनाने का प्रावधान किया गया |सतेन्द्र प्रसाद सिन्हा वायसराय की कार्यपालिका परिषद् के प्रथम भारतीय सदस्य बने | उन्हें विधि सदस्य बनाया गया था |
8         इस अधिनियम में पृथक निर्वाचन के आधार पर मुस्लिमों के लिए सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया | इसके अन्तर्गत मुस्लिम सदस्यों का चुनाव मुस्लिम मतदाता ही कर सकते है |इस प्रकार इस अधिनियम ने साम्प्रदायिकता को वैधानिकता प्रदान की |
9         इसने प्रेसीडेंसी कारपोरेशन , चैम्बर्स ऑफ़ कॉमर्स , विश्वविद्यालयों और जमींदारों के लिए अलग प्रतिनिधित्व का प्रावधान भी किया |
10     इस अधिनियम मे अंग्रेजो की फूट डालो और राज करो की नीति स्‍पष्‍ट होती है। लार्ड मिन्‍टो को सांप्रदायिक निर्वाचक मंडल के जनक के रूप में जाना जाता है।


10. 1919 ई० का भारत शासन अधिनियम [मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार] -
(i) केंद्र में द्विसदनात्मक विधायिका की स्थापना की गई- प्रथम राज्य परिषद तथा दूसरी केंद्रीय विधान सभा. राज्य परिषद के सदस्यों की संख्या 60 थी; जिसमें 34 निर्वाचित होते थे और उनका कार्यकाल 5 वर्षों का होता था. केंद्रीय विधान सभा के सदस्यों की संख्या 145 थी, जिनमें 104 निवार्चित तथा 41 मनोनीत होते थे. इनका कार्यकाल 3 वर्षों का था. दोनों सदनों के अधिकार समान थे. इनमें सिर्फ एक अंतर था कि बजट पर स्वीकृति प्रदान करने का अधिकार निचले सदन को था.

(ii) प्रांतो में द्वैध शासन प्रणाली का प्रवर्तन किया गया. इस योजना के अनुसार प्रांतीय विषयों को दो उपवर्गों में विभाजित किया गया- आरक्षित तथा हस्तांतरित. आरक्षित विषय थे - वित्त, भूमिकर, अकाल सहायता, न्याय, पुलिस, पेंशन, आपराधिक जातियां, छापाखाना, समाचार पत्र, सिंचाई, जलमार्ग, खान, कारखाना, बिजली, गैस, व्यालर, श्रमिक कल्याण, औघोगिक विवाद, मोटरगाड़ियां, छोटे बंदरगाह और सार्वजनिक सेवाएं आदि.

हस्तांतरित विषय -
शिक्षा, पुस्तकालय, संग्रहालय, स्थानीय स्वायत्त शासन, चिकित्सा सहायता.
 सार्वजनिक निर्माण विभाग, आबकारी, उघोग, तौल तथा माप, सार्वजनिक मनोरंजन पर नियंत्रण, धार्मिक तथा अग्रहार दान आदि.
(iii) आरक्षित विषय का प्रशासन गवर्नर अपनी कार्यकारी परिषद के माध्यम से करता था; जबकि हस्तांतरित विषय का प्रशासन प्रांतीय विधान मंडल के प्रति उत्तरदायी भारतीय मंत्रियों के द्वारा किया जाता था.
(iv) द्वैध शासन प्रणाली को 1935 ई० के एक्ट के द्वारा समाप्त कर दिया गया.
(v) भारत सचिव को अधिकार दिया गया कि वह भारत में महालेखा परीक्षक की नियुक्ति कर सकता है.
(vi) इस अधिनियम ने भारत में 1926 मे एक लोक सेवा आयोग के गठन का प्रावधान किया.
() इस अधिनियम मे प‍हलि बार महिलाओ को बोट देने का अधिकार दिया गया।
() इस अधिनियम द्वारा भारत मे 11 प्रांत बनाये गये थे।
नोट—1926 में सिविल सेवको की भर्ती ( ली आयोग की सिफारिशरिश पर ) के लियें केंद्रीय लोक सेवा आयेाग का गठन किया गया। लोक सेवा आयेा्ग का गठन 1926 में किया गया । जिसके प्रथम अध्‍यक्ष सर रोस बार्कर थे। लोकमान्‍य तिलक ने 1919 के अधिनियम को एक बिना सूरज का सवेरा बताया है।
1927 का साईमन कमीशन – 1919 में पारित अधिनियम की जांच हेतु सर जान साइमन के नेतृत्‍व में छ: अंग्रेज सदस्‍यों का एक आयेाग का गठन किया गया। इस आयोग का संपूर्ण भारत में विरोध किया गया क्‍योंकि इसमें एक भी भारतीय नहीं था इस कारण इसे व्‍हाइट मैन कमीशन भी कहा जाता है।
सदस्‍य कमीशन के सदस्‍य --- 1 सर जान साइमन 2 क्‍लीमेन्‍ट एटली  3 हैरी लेवी लासन  4 जाजै लेन फॉक्‍स  5 डोनाल्‍ड हावर्ड  6 एडवर्ड कैडगॉन  7 बरनॉन हार्टस्‍हांते

नेहरू रिपोर्ट(1928)--- बर्न हेड ( बर्केन हेड) नामक अंग्रेज अधिकारी के चुनौती देने पर यह रिपोर्ट मोतीलाल नेहरू द्वारा प्रस्‍तुत की गई थी। नहरू रिपोर्ट को संविधान का ब्‍लू प्रिंट(नीला पत्र) कहा  जाता है। नेहरू रिपोर्ट 1928 के कांग्रेस अधिवेशन मे प्रस्‍तुत की गई थी। इस रिपोर्ट में भारत को डोमेनियन स्‍टेट की मांग रखी गई।

सांप्रदायिक अवार्ड पूना पैक्‍ट—अगस्‍त 1932 में रैम्‍जे मैक्‍डोनाल्‍ड ने अल्‍प्‍संख्‍यको  के प्रतिनिधित्‍व पर एक योजना प्रस्‍तुत की जिसका गांधी जी द्वारा विरोध हुआ और कांग्रेस नेताओं और दलित नेता भीमराव अम्‍ब्‍ेाडकर के बीच एक समझौता हुआ था जिसे पूना पैक्‍ट कहा गया।

10. 1935 ई० का भारत शासन अधिनियम:
1935 ई० के अधिनियम में 451 धाराएं और 15 परिशिष्ट. थे. इस अधिनियम द्वारा संवैधानिक निरंकुसता का सिद्धांत प्रवृत किया गया। इसके द्वारा केन्‍द्र व राज्‍य के मध्‍य शक्तियों का स्‍पष्‍ट विभाजन कर दिया गया। इस अधिनियम की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:
(i) अखिल भारतीय संघ: यह संघ 11 ब्रिटिश प्रांतो, 6 चीफ कमिश्नर के क्षेत्रों और उन देशी रियासतों से मिलकर बनना था, जो स्वेच्छा से संघ में सम्मलित हों. प्रांतों के लिए संघ में सम्मिलित होना अनिवार्य था, किंतु देशी रियासतों के लिय यह एच्छिक था. देशी रियासतें संघ में सम्मिलित नहीं हुईं और प्रस्तावित संघ की स्थापना संबंधी घोषणा-पत्र जारी करने का अवसर ही नहीं आया.
(ii) प्रांतीय स्वायत्ता: इस अधिनियम के द्वारा प्रांतो में द्वैध शासन व्यवस्था का अंत कर उन्हें एक स्वपतंत्र और स्वशासित संवैधानिक आधार प्रदान किया गया.
(iii) केंद्र में द्वैध शासन की स्थापना: कुछ संघीय विषयों [सुरक्षा, वैदेशिक संबंध, धार्मिक मामलें] को गवर्नर जनरल के हाथों में सुरक्षित रखा गया. अन्य संघीय विषयों की व्यवस्था के लिए गवर्नर- जनरल को सहायता एवं परामर्श देने हेतु मंत्रिमंडल की व्यवस्था की गई, जो मंत्रिमंडल व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी था.
(iv) संघीय न्यामयालय की व्यवस्था: इसका अधिकार क्षेत्र प्रांतों तथा रियासतों तक विस्तृत था. इस न्यायलय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा दो अन्य न्यायाधीशों की व्यवस्था की गई. न्यायालय से संबंधित अंतिम शक्ति प्रिवी काउंसिल [लंदन] को प्राप्त थी.भारत में संघीय न्‍यायालय की स्‍थापना 1937 में भारत शासन अधिनियम 1935 के तहत की गई थी।
(v) ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता: इस अधिनियम में किसी भी प्रकार के परिवर्तन का अधिकार ब्रिटिश संसद के पास था. प्रांतीय विधान मंडल और संघीय व्यवस्थापिका: इसमें किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं कर सकते थे.
(vi) भारत परिषद का अंत : इस अधिनियम के द्वारा भारत परिषद का अंत कर दिया गया.
(vii) सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति का विस्तार: संघीय तथा प्रांतीय व्यवस्थापिकाओं में विभिन्न सम्प्रदायों को प्रतिनिधित्व देने के लिए सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति को जारी रखा गया और उसका विस्तार आंग्ल भारतीयों - भारतीय ईसाइयों, यूरोपियनों और हरिजनों के लिए भी किया गया.
(viii) इस अधिनियम में प्रस्तावना का अभाव था.
(xi) इसके द्वारा बर्मा,बरार एवं अदन को भारत से अलग कर दिया गया, अदन को इंग्लैंड के औपनिवेशिक कार्यालय के अधीन कर दिया गया और बरार को मध्य प्रांत में शामिल कर लिया गया.
(10) राष्‍ट्रपति को अध्‍यादेश निर्गत करने की शकित प्रदान किया गया।
() गर्वनरो का विधायी क्रियाओ मे निषेधाधिकार (वीटो) की शक्ति तथा स्‍वयं द्वारा विधि बनाना। साम्‍प्रदायिक प्रतिनिधित्‍व के नियम को समाप्ति किया गया।
() सिंध और उडिसा राज्‍य का गठन 1935 के अधिनियम द्वारा किया गया ।
नेाट— 1 मुस्लिम लीग के मोहम्‍मद अली जिन्‍ना ने इसे पूर्णत्‍या सडा हुआ मूल रूप से अस्‍वीकृत बताया।
2 जवाहर लाल नेहरू ने इसे दासता का नया चार्टर कहा है। नहरू ने ही इसे अनेक ब्रेको वाली इंजन रहित मशीन कहा है।
3 पं0 मदन मोहन मालवीय ने इसे बाहरी रूप से जनतत्रवादी व अन्‍दर से खोखला कहा है।
अधिनियम
गवर्नर जनरल/वायसराय
रेगयुलेटिंग एक्‍ट 1773
वारेन हेसिटंग्‍स
पिटस इडिया एक्‍ट 1784
वारेन हेस्टिंगस
1786 का अधिनियम
लार्ड कॉर्नवालिस
चार्टर अधिनियम 1793
सर जान शोर
चार्टर अधिनियम 1813
लॉर्ड हेस्टिग्‍ंस
चार्टर अधिनियम 1833
लॉर्ड विलियम बैंटिक
चार्टर अधिनियम 1853
लॉर्ड डलहौजी
भारत सरकार अधिनियम 1858
लॉर्ड कैनिंग
भारतीय परिषद अधिनियम 1861
लॉर्ड एल्गिन प्रथम
भारतीय परिषद अधिनियम 1892
लॉर्ड लैंसडाउन
भारतीय परिषद अधिनियम 1909
लॉर्ड मिण्‍टो द्वितीय
भारतीय सरकार अधिनियम 1919
लॉर्ड चैम्‍सफोर्ड
भारत सरकार अधिनियम 1935
लॉर्ड विलिंगटन

कैबिनेट मिशन – 1946 द्वितिय विश्‍व युद्ध समाप्‍त होने के बाद ब्रिटेन मे लेबर पार्टी सता मे आयी और भारतीय समस्‍याओं के लिए मार्च 1946मे कैबिनेट मिशन भारत भेजा गया। इसमें तीन सदस्‍य लार्ड पेंथिक लारेन्‍स , स्‍टेफर्ड क्रिप्‍स और ए0वी0 एलेक्‍जेंडर थे। कैबिनेट मिशन का मुख्‍य कार्य संविधान सभा का गठन कर भारतियों के लिए भारतीयों द्वारा संविधान बनाने का कार्य आरम्‍भ करना था।


11. 1947 ई० का भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम:
वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत के सभी राजनितिक दलों से विचार विमर्श के पश्‍चात 3 जून 1947 को भारत के विभाजन की योजना प्रस्‍तुत की जिसे माउंटबेटन योजना कहा जाता है।
ब्रिटिश संसद में 4 जुलाई, 1947 ई० को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम प्रस्तावित किया गया, जो 18 जुलाई, 1947 ई० को स्वीकृत हो गया. इस अधिनियम में 20 धाराएं थीं. अधिनियम के प्रमुख प्रावधान निम्न हैं -
(i) दो अधिराज्यों की स्थापना:14- 15 अगस्त, 1947 ई० की मध्‍यरात्रि  को भारत एवं पाकिस्तान नामक दो अधिराज्य बना दिए जाएंगें, और उनको ब्रिटिश सरकार सत्ता सौंप देगी. सत्ता का उत्तरदायित्व दोनों अधिराज्यों की संविधान सभा को सौंपा जाएगा.
(ii) भारत एवं पाकिस्तान दोनों अधिराज्यों में एक-एक गवर्नर जनरल होंगे, जिनकी नियुक्ति उनके मंत्रिमंडल की सलाह से की जाएगी.
(iii) संविधान सभा का विधान मंडल के रूप में कार्य करना- जब तक संविधान सभाएं संविधान का निर्माण नई कर लेतीं, तब तक वह विधान मंडल के रूप में कार्य करती रहेंगीं.
(iv) भारत-मंत्री के पद समाप्त कर दिए जाएंगें.
(v) 1935 ई० के भारतीय शासन अधिनियम द्वारा शासन जब तक संविधान सभा द्वारा नया संविधान बनाकर तैयार नहीं किया जाता है; तब तक उस समय 1935 ई० के भारतीय शासन अधिनियम द्वारा ही शासन होगा.
(vi) देशी रियासतों पर ब्रिटेन की सर्वोपरिता का अंत कर दिया गया. उनको भारत या पाकिस्तान किसी भी अधिराज्य में सम्मलित होने और अपने भावी संबंधो का निश्चय करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई.
लार्ड माउंट बेटन नए डोमिनियंन भारत के प्रथम गवर्नर जनरल बने।(15 अगस्‍त 1947 से 21 जून 1948)1948) लॉर्ड माउंटबेटन ने जवाहरलाल नेहरू को भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलाई।
1946 में बनी संविधान सभा को भारत की संसद के रूप में स्वीकार किया गया।
नोट – स्‍वतंत्र भारत के प्रथम व अंतिम भारतीय गवर्नर जनरल सी. राज गोपाला चार्य बने।( 21 जुन 1948 से 26 जनवरी 1950 तक)
जब स्‍वतंत्रता की माउण्‍टबेटन योजना स्‍वीकार की गयी उस समय भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस का अध्‍यक्ष आचार्य जे0बी0 कृपलानी।

अंतरिम सरकार 1946


क्र0
सदस्‍य
धारित विभाग
1
जवाहरलाल नेहरू
राष्‍ट्रमंडल संबंध तथा विदेशी मामले
2
सरदार वल्‍लभ भाई पटेल
गृह सूचना एवं प्रसारण
3
डा0 राजेन्द्र प्रसाद
खाध एवं कृषि
4
जान मथाई
उधोग एवं नागरिक आपूर्ति
5
जगजीवन राम
श्रम
6
सरदार बलदेव सिंह
रक्षा
7
सी एच भाभा
कार्य खान एवं उर्जा
8
लियाकत अली खां
वित्‍त
9
अब्‍दुर रब निश्‍तार
डाक एवं वायु
10
आसफ अली
रेलवे एवं परिवहन
11
सी राजगेापालाचारी
शिक्षा एवं कला
12 
आई0 आई0 चुंदरीगर
वाण्रिज्‍य
13
गजनफर अली खान
स्‍वास्‍थ्‍य
14
जोगेंद्र नाथ मंडल
विधि
अंतरिम सरकार के सदस्‍य वायसराय की कार्यकरी परिषद के सदस्‍य थे। वायसराय परिषद का प्रमुख बना रहा लेकिन जवाहरलाल नेहरू को परिषद का उपाध्‍यक्ष बनाया गया।
स्‍वतंत्र भारत का  पहला मंत्रिमंडल 1947


क्र0
सदस्‍य
धारित विभाग
1
जवाहरलाल नेहरू
राष्‍ट्रमंडल संबंध तथा विदेशी मामले वैज्ञानिक शोध प्रधानमंत्री
2
सरदार वल्‍लभ भाई पटेल
गृह सूचना एवं प्रसारण राज्‍येा के मामले
3
डा0 राजेन्द्र प्रसाद
खाध एवं कृषि
4
मौलाना अबुल कलाम आजाद
शिक्षा
4
डा श्‍यामा प्रसाद मुखर्जी
उधोग एवं नागरिक आपूर्ति
5
जगजीवन राम
श्रम
6
सरदार बलदेव सिंह
रक्षा
7
रफी अहमद किदवई
संचार  
8
आर के षणमुगम शेटटी
वित्‍त
9
वी एन गाडगिल  
कार्य खान एवं उर्जा
10
डा जान मथाई
रेलवे एवं परिवहन
12 
सी एच भाभा
वाण्रिज्‍य
13
राजकुमारी अमृत कौर
स्‍वास्‍थ्‍य
14
डा बी आर अम्‍बेडकर
विधि
नोट—भारत सरकार अधिनियम 1935 मे अन्‍तर्विष्‍ट अनुदेश प्रपत्र को वर्ष 1950 में भारत के संविधान मे किस रूप मे समाविष्‍ट किया गया—भारत सरकार के कार्य का संचालन।

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